हिंदी की उपयोगिता एवं हिंदी के समक्ष चुनौतियां

— हेमचंद्र सकलानी—
देहरादून: मनुष्य के द्वारा अब तक किए गए आविष्कारों में यदि सर्वश्रेष्ठ सर्वपयोगी आविष्कार चुना जाए तो वह अक्षर भाषा शब्द लिपि के अलावा शायद कोई ना होगा, इन्हीं के कारण मनुष्य आज यहां तक पहुंच पाया। विश्व की सबसे प्राचीन भाषा होने का गौरव संस्कृत को मिला जिससे फिर ब्रह्मलिपि फिर देवनागरी लिपि का जन्म हुआ। आठवीं शताब्दी में मुहम्मद बिन कासिम फिर 1991- 9192 में मुगलों के काल में उर्दू अरबी फारसी का खूब प्रचार प्रसार हुआ तो अंग्रेजों के शासनकाल में अंग्रेजी का प्रचार प्रसार भी खूब हुआ। सन 1757 में अंग्रेजों के आगमन के बाद शासन की राजकाज की न्यायालय की भाषा अंग्रेजी हो गई थी। बड़े और साधारण भारतीयों का मोह भी अंग्रेजी की तरफ बढ़ता गया। जनसाधारण की, बस आम बोलचाल की भाषा खड़ी बोली या ब्रज भाषा रह गई थी पर इससे देश का काम नहीं चलना था।
हजारों जातियों,कई धर्मों,क्षेत्रीय बोलियां,रीति रिवाजों,परंपराओं, मान्यताओं वाले देश में एकता की सबसे बड़ी चुनौती थी। जिसे एक सामान्य जनसंपर्क भाषा और राजभाषा के माध्यम से पूरा किया जा सकता था। और उसमें आज हिंदी अपनी बहुत उत्तरदायित्वपूर्ण और उपयोगिता की पूर्ण भूमिका निभा रही है। जिस उर्दू अंग्रेजी फारसी का किसी समय परचम देश में लहराता था हिंदी ने उसे आज हाशिये पर ला दिया है।
शायद जन मानस पर मैथिली शरण गुप्त जी की पंक्तियों का प्रभाव था “जिसे न निज भाषा तथा निज देश पर अभिमान है वह नर नहीं नर पशु निरा और मृतक सम्मान है।” भारतेंदु हरिश्चंद्र जी का जन्म 1850 में हुआ था और 1885 में मात्र 35 वर्ष की अवस्था में उनकी मृत्यु हुई। इन थोड़े से वर्षों में उन्होंने हिंदी के विकास में अपना बहुमूल्य योगदान दिया जिसके कारण उन्हें हिंदी का जनक,हिंदी का भीष्म पितामह कहा जाता है। उस समय कोई भाषा नहीं थी तब भाषा के महत्व रेखांकित करते उन्होंने यह पंक्तियां लिखी थी “निज भाषा उन्नति है सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा ज्ञान के मिटते नहीं है को शूल।”
हमारे देश का स्वतंत्रता आंदोलन इस बात का उदाहरण है कि इस देश को जोड़ने का,एकता के सूत्र में पिरोने का जो कार्य हिंदी ने किया था वह और कोई नहीं कर सका। यह कटु सत्य है कि ढाई हजार बोलियों भाषा से हम विश्व में क्या अपने देश में ही अपनी पहचान नहीं बना सकते। लेकिन हिंदी से हम, देश को एक करके एक सूत्र में पिरो कर‌ पूरे विश्व में अपनी एक अलग पहचान अवश्य बना सकते हैं।
राष्ट्रपति डॉक्टर जाकिर हुसैन ने भी कहा है “इस मुल्क में बोली जाने वाली तरह तरह की जुबान अगर फूल है तो हिंदी वह धागा है जिसमें इन फूलों को पिरो कर इस देश के लिए एक खूबसूरत हार बनाया जा सकता है।” पर सबसे बड़ी चुनौती हिंदी के सामने यह है कि हर राज्य, हर समाज,अपनी बोली को राजभाषा बनाना चाहता है। जबकि बोली की सुंदरता बोली में ही होती है ।देश के लिए एक भाषा के महत्व को स्वीकार कर समझते हुए भारत की संविधान सभा ने चौदह सितंबर 1947 को हिंदी को राजभाषा बनाने की घोषणा की।
फिल्मों ने और मजदूरों ने हिंदी को पूरे देश में फैलने का अभूतपूर्व कार्य किया। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने अधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया और 26 जनवरी 1950 में हिंदी राजभाषा बनी।
आज हिंदी कश्मीर से कन्याकुमारी कच्छ रण से अरुणांचल तक पूरे भारत के स्कूलों में पढ़ाई जा रही है। यह हिंदी की उपयोगिता ही है की विश्व के अनेक देशों मे हिंदी में सेमिनार आयोजित हो रहे हैं,वहां के दूरदर्शन से हिंदी में कार्यक्रम प्रसारित हो रहे हैं। अनेक देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है,छात्र छात्राएं शोध का कार्य कर रहे हैं। वहां के लेखक हिंदी में साहित्य सृजन कर रहे हैं।
अपने देश भर की यात्राओं कश्मीर से कन्याकुमारी और केरल तमिलनाडु और कच्छ रण से इम्फाल आदि तक के दौरान अनुभव हुआ लोग भले ही टूटी फूटी हिंदी में बात कर रहे थे पर कर रहे थे। यदि देश के बुद्धिजीवियों ने हिंदी के साथ ईमानदारी से कार्य किया होता तो हिन्दी हर ओर अपनी खुशब बिखर रही होती। बोली भाषा किसी भी मानव समुदाय कि ही नहीं देश की राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान होती है।।
यदि भाषा लिपि न होती तो हम अपने प्राचीन गौरवशाली इतिहास को कैसे जान पाते। इतने बड़े देश में सैकड़ों जातियों बलियों के बीच हिंदी को राजभाषा राष्ट्रभाषा बनाना चुनौती पूर्ण कार्य था। हिंदी को अपनी ही बोलियों और भाषाओं से संघर्ष करना पड़ा फिर भी आज हिंदी ही है जो देश को एकता के सूत्र में बांधती नजर आती है। यही नहीं अब 10 जनवरी को पूरे विश्व में विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है।
बड़े दुख की बात है की विश्व में केवल एक हमारा देश है जहां भाषा के बीच झगड़े होते हैं अभी हाल में महाराष्ट्र में हिंदी के विरोध में काफी बहस हुई और कहा जाता है की अब राज्य के काम केवल अंग्रेजी में और मराठी में होंगे। निजी स्वार्थ में केवल नेतागिरी की हवस‌ में हम बिल्कुल यह भूल गए कि विश्व में किसी भी देश की पहचान उसकी भाषा से होती है उसके राष्ट्रगान से होती है उसके राष्ट्ध्वज से होती है।
आज सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम क्षेत्रीय बोली भाषा के झगड़ों को भूलकर क्षुद्र राजनीति से ऊपर उठकर हिंदी को भारत में ही नहीं पूरे विश्व में स्थापित करने के लिए कार्य करें। इससे हिंदी भाषा की चुनौतियां जो थोड़ी बहुत हैं वह खत्म होंगी और इसकी उपयोगिता और बढ़ेगी जब इसे हम और सरस व सुंदर जनभाषा बनाने के लिए कार्य करेंगे। हमें अच्छी तरह समझ लेना चाहिए भाषा कोई भी बुरी नहीं होती पर अपनी भाषा अपनी जान होती है। अंग्रेजी को ही देख लीजिये पूरे विश्व में आप आराम से कहीं भी घूम सकते हैं यदि इस भाषा का ज्ञान हो।
अंत मैं यही कहना चाहूंगा —
होठों पर हमेशा अपने
जन गण मन राष्ट्रगान रखना
दिल में हमेशा अपने राष्ट्र के प्रति
आदर सेवा सम्मान रखना
बोली भाषा जो भी बोलना चाहो बोलना तुम
मगर कश्मीर से कन्याकुमारी तक
और कच्छ रण से अरुणांचल तक
एक हिंदी एक हिंदुस्तान रखना।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *