
देहरादून। गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष्य पर श्निरंजन धाराश् एवं श्लेखक गाँवश् द्वारा श्शुभ यात्रा स्पिरिचुअल वर्ल्डश् के सहयोग से अटल प्रेक्षागृह, लेखक गाँव में आयोजित श्सुर संध्या-2026 भारतीय शास्त्रीय संगीत, गुरु-शिष्य परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों का भव्य उत्सव बनकर सामने आया। संगीत, साहित्य और अध्यात्म के इस विशेष आयोजन ने श्रोताओं को भारतीय शास्त्रीय संगीत की गरिमा और गुरु परंपरा की महत्ता से भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं अतिथियों के स्वागत के साथ हुआ। इसके पश्चात आयोजकों ने निरंजन धारा एवं लेखक गाँव की सांस्कृतिक एवं सामाजिक गतिविधियों तथा भारतीय कला एवं संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी।
मुख्य अतिथि, प्रख्यात साहित्यकार, पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने अपने संबोधन में कहा कि गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय संस्कृति की आत्मा है और शास्त्रीय संगीत हमारी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है। उन्होंने युवा कलाकारों का आह्वान करते हुए कहा कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है। विशिष्ट अतिथि पद्मश्री प्रेमचंद शर्मा ने कहा कि भारतीय शास्त्रीय संगीत हमारी सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य धरोहर है। उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा को भारतीय संस्कृति की आधारशिला बताते हुए कहा कि ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। उन्होंने इस आयोजन के लिए निरंजन धारा एवं लेखक गाँव की सराहना की।
कार्यक्रम के आकर्षण में सुप्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय बाँसुरी वादक सौरभ प्रसाद बनौधा रहे। वे विख्यात बाँसुरी वादक स्वर्गीय पंडित निरंजन प्रसाद के शिष्य एवं पुत्र हैं तथा उन्हें अपने दादाजी, शहनाई एवं बाँसुरी के दिग्गज कलाकार स्वर्गीय पंडित भोलानाथ प्रसन्न से भी संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई। बनारस शैली की समृद्ध परंपरा के संवाहक श्री बनौधा संस्कृति मंत्रालय के पैनल कलाकार एवं प्रसार भारती के ग्रेडेड कलाकार हैं। श्निरंजन धाराश् के मुख्य मार्गदर्शक के रूप में वे भारतीय शास्त्रीय संगीत की युवा प्रतिभाओं को मंच और मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए समर्पित हैं। देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी प्रस्तुतियों से पहचान बना चुके श्री बनौधा को वेणु रत्न, श्भारत माता अभिनंदन सम्मान, कला सम्मान एवं युवा अलंकार सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है।
संगीत संध्या का शुभारंभ शिष्यों द्वारा राग दुर्गा पर आधारित स्वर-वृंद प्रस्तुति से हुआ, जिसने भक्ति, अनुशासन और सामूहिक साधना का मनोहारी वातावरण निर्मित किया। इसके उपरांत राग हंसध्वनि पर आधारित स्वर एवं बाँसुरी ऑर्केस्ट्रा ने अपनी सुरमयी प्रस्तुति से सभागार को संगीत की मधुर लहरियों से सराबोर कर दिया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न शहरोंकृदिल्ली, वाराणसी, दुर्गापुर, हैदराबाद एवं बेंगलुरुकृसे आए शिष्यों ए.के. छाबड़ा, अंशुमन, दक्ष खटवा, इंदु गर्ग, ज्योति, मानव बंधु, एन.एम. गुप्ता, नीलांजना, ओंकार बनौधा, प्रतिष्ठा, ऋषि, रुचि शुक्ला, संचिता, संस्कार बनौधा, सुनील बजाज, उप्पेश गोजा, वैभव गोयल, विनय शुक्ला एवं यशिका शुक्ला ने अपनी उत्कृष्ट प्रस्तुतियों से कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई।
संगीत संध्या का चरम आकर्षण गुरु सौरभ प्रसाद बनौधा का एकल बाँसुरी वादन रहा, जिसमें तबले पर दक्ष मकवाना ने प्रभावपूर्ण संगत की। प्रस्तुति का आरंभ राग चारुकेशी से हुआ, जिसके पश्चात मनमोहक भटियाली धुन प्रस्तुत की गई। कार्यक्रम का समापन सूफी संत अमीर खुसरो की अमर रचना श्छाप तिलक सब छीनीश् की भावपूर्ण प्रस्तुति से हुआ, जिसने पूरे सभागार को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस अवसर पर लेखक गांव की निदेशक विदुषी निशंक, डॉ. जे.एस. इंदौरिया (प्राचार्य, स्पर्श हिमालय विश्वविद्यालय), सचिव बालकृष्ण चमोली, गढ़वाल विश्वविद्यालय के डॉ. सर्वेश उनियाल, साहित्यकार बेचैन कंडियाल सहित अनेक कलाकारों, साहित्यकारों, शिक्षाविदों, विद्यार्थियों एवं संगीत प्रेमियों की उपस्थिति रही।
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