क्या बदल रही है राजनीतिक चेतना की दिशा?

–सुभाष चंद्र जोशी–

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) एक बार फिर व्यापक जनाक्रोश का केंद्र बना हुआ है। रावलकोट में हजारों लोगों की भागीदारी के साथ चल रहा सरकार विरोधी आंदोलन केवल किसी एक प्रशासनिक निर्णय के विरुद्ध असंतोष नहीं, बल्कि वर्षों से उपेक्षित जनभावनाओं, आर्थिक संकट, प्रशासनिक असंतोष और राजनीतिक अधिकारों की मांग का संगठित स्वर बनकर उभरा है। यह आंदोलन इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि अब वहां की जनता केवल आश्वासनों से संतुष्ट नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन, उत्तरदायी शासन और न्यायपूर्ण व्यवस्था की अपेक्षा कर रही है।

रावलकोट के ईदगाह मैदान में चल रहे इस आंदोलन का नेतृत्व संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) कर रही है। आंदोलनकारी संगठन लंबे समय से महंगाई पर नियंत्रण, बिजली संकट के समाधान, रोजगार के अवसर, स्थानीय संसाधनों पर अधिकार तथा प्रशासनिक पारदर्शिता जैसी मांगों को प्रमुखता से उठाते रहे हैं। इन मांगों का स्वर अब इतना व्यापक हो चुका है कि वह केवल स्थानीय आंदोलन न रहकर पाकिस्तान की नीतियों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता दिखाई दे रहा है।

आंदोलन के दौरान जेएएसी के नेता सरदार अमान खान ने अपने संबोधन में पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था और नीतियों पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि अतीत में स्थानीय युवाओं को हथियार उपलब्ध कराए गए और अब उन्हीं लोगों को आतंकवाद से जोड़कर देखा जा रहा है। उन्होंने एक पूर्व सार्वजनिक कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि उस समय हथियारबंद जुलूसों को प्रशासनिक अनुमति और सुरक्षा भी प्रदान की गई थी। यद्यपि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है तथा पाकिस्तान सरकार अथवा सेना की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, फिर भी ऐसे आरोप आंदोलन की गंभीरता और जनाक्रोश की तीव्रता को स्पष्ट करते हैं।

आंदोलन के दौरान नेताओं ने यह भी कहा कि यदि उनकी 38 प्रमुख मांगों पर शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन और व्यापक स्वरूप ग्रहण करेगा। कुछ वक्ताओं ने क्षेत्र के भविष्य को लेकर राजनीतिक टिप्पणियां भी कीं तथा भारत के साथ संबंधों का उल्लेख किया। हालांकि ऐसे वक्तव्यों को पूरे क्षेत्र की सामूहिक भावना का प्रतिनिधित्व मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि इस संबंध में कोई आधिकारिक अथवा सर्वमान्य जनमत उपलब्ध नहीं है।

वस्तुतः पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में असंतोष कोई नई घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में बढ़ती महंगाई, ऊर्जा संकट, कर व्यवस्था, बेरोजगारी और प्रशासनिक उपेक्षा के विरुद्ध अनेक बार बड़े आंदोलन हुए हैं। वर्ष 2024 में भी व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद पाकिस्तान सरकार को कुछ राहत संबंधी घोषणाएं करनी पड़ी थीं। किंतु स्थानीय संगठनों का आरोप है कि मूल समस्याओं का स्थायी समाधान आज भी नहीं हो पाया है।

विश्लेषकों का मानना है कि इस क्षेत्र में केवल आर्थिक समस्याएं ही नहीं, बल्कि राजनीतिक भागीदारी और प्रशासनिक अधिकारों का प्रश्न भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्थानीय संगठनों का कहना है कि अधिकांश महत्वपूर्ण निर्णय इस्लामाबाद में लिए जाते हैं, जबकि स्थानीय जनता की भूमिका सीमित रहती है। परिणामस्वरूप शासन और जनता के बीच विश्वास का संकट लगातार गहराता जा रहा है।

भारत का आधिकारिक दृष्टिकोण लंबे समय से स्पष्ट रहा है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। भारत समय-समय पर इस क्षेत्र में लोकतांत्रिक अधिकारों, मानवाधिकारों तथा विकास संबंधी मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है। दूसरी ओर पाकिस्तान इन आरोपों को अस्वीकार करते हुए अपने प्रशासनिक ढांचे का समर्थन करता है।

वर्तमान परिस्थितियों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या पाकिस्तान सरकार इस बढ़ते जनाक्रोश को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानकर नियंत्रित करने का प्रयास करेगी, अथवा जनता की वास्तविक समस्याओं के समाधान की दिशा में गंभीर पहल करेगी। इतिहास साक्षी है कि किसी भी समाज में असंतोष को केवल बल प्रयोग अथवा प्रशासनिक कठोरता से स्थायी रूप से समाप्त नहीं किया जा सकता। जनविश्वास की पुनर्स्थापना संवाद, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और न्यायपूर्ण शासन से ही संभव होती है।

रावलकोट से उठ रही आवाज़ें यह संकेत देती हैं कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की जनता अब केवल आर्थिक राहत ही नहीं, बल्कि सम्मान, अधिकार, सहभागिता और उत्तरदायी शासन की आकांक्षा रखती है। आने वाले समय में पाकिस्तान सरकार इस जनभावना का किस प्रकार उत्तर देती है, यह न केवल पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की आंतरिक राजनीति, बल्कि पूरे क्षेत्र की सामरिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों को भी प्रभावित कर सकता है।

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