देहरादून: आदि गुरु शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में भारत के चारों प्रमुख धाम—बदरीनाथ, द्वारका, पुरी और रामेश्वरम्—की पदयात्रा कर सनातन धर्म को पुनः संगठित एवं सुदृढ़ किया। उन्होंने संपूर्ण भारत का भ्रमण कर धार्मिक एवं सांस्कृतिक एकता का संदेश दिया तथा उत्तराखण्ड के बदरीनाथ और केदारनाथ धाम में पूजा-अर्चना की परंपरा को पुनः प्रतिष्ठित कर तीर्थयात्रा की महान परंपरा को नई दिशा प्रदान की।
इसी प्रकार काली कमली के महाराज जी (स्वामी विशुद्धानंद महाराज) ने लगभग 1880 ईस्वी में उत्तराखण्ड के चारधाम की पदयात्रा की। तीर्थयात्रियों की कठिनाइयों को देखकर उन्होंने गंगा तट पर पहला प्याऊ स्थापित किया तथा बाद में पूरे यात्रा मार्ग पर अनेक धर्मशालाओं, चट्टियों एवं विश्राम स्थलों का निर्माण कराया, जिनका लाभ आज भी लाखों श्रद्धालु प्राप्त करते हैं।
इसी महान परंपरा का अनुसरण करते हुए डॉ. ज्योति प्रसाद गैरोला जो भांगला गांव दोगी पट्टी निवासी टिहरी गढ़वाल ,के है उन्होंने 35 दिनों में लगभग 1600 किलोमीटर की शास्त्रोक्त पदयात्रा पूर्ण कर उत्तराखण्ड के चारधाम, पंचकेदार एवं पंच बदरीनाथ के दर्शन किए। सनातन परंपरा में ऐसी पदतीर्थ यात्रा को आत्मशुद्धि, मानसिक शांति, पुण्य एवं मोक्षदायिनी माना गया है।
यमुनोत्री धाम
देवी यमुना सूर्यदेव की पुत्री तथा यमराज की बहन मानी जाती हैं। यमुनोत्री में स्नान एवं मां यमुना के दर्शन-पूजन से यमराज का भय दूर होता है तथा भक्तों के कष्टों का निवारण होता है। यह चारधाम यात्रा का प्रथम पड़ाव है।
गंगोत्री धाम
राजा भागीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुईं। भगवान शिव ने उनके प्रचंड वेग को अपनी जटाओं में धारण कर पृथ्वी की रक्षा की। शीतकाल में गंगोत्री मंदिर के कपाट बंद होने पर मां गंगा की पूजा मुखवा गांव में की जाती है।
केदारनाथ एवं पंचकेदार
केदारनाथ भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक तथा उत्तराखण्ड के चारधाम का प्रमुख धाम है। स्कन्द पुराण के केदारखण्ड में वर्णित है कि भगवान शिव स्वयं केदार क्षेत्र में विराजमान होकर अपने भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
महाभारत युद्ध के उपरांत पांडव अपने पापों के प्रायश्चित हेतु भगवान शिव की शरण में पहुंचे। भगवान शिव बैल (नंदी) का रूप धारण कर अंतर्ध्यान होने लगे, किंतु भीम ने उन्हें पहचान लिया। उसी समय भगवान शिव का कूबड़ (पीठ) केदारनाथ में प्रकट हुआ, जबकि उनके अन्य अंग मध्यमहेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ एवं कल्पेश्वर में प्रकट हुए। यही पाँच पवित्र धाम पंचकेदार कहलाते हैं।
केदारनाथ मंदिर में भगवान शिव के स्वयंभू शिलारूप की पूजा की जाती है। प्रातःकाल रुद्राभिषेक, जलाभिषेक, गंगाजल, पंचामृत, घृत, मधु तथा बिल्वपत्र अर्पित किए जाते हैं। सायंकाल की भव्य आरती श्रद्धालुओं को अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति कराती है। ऐसी मान्यता है कि बाबा केदार के शास्त्रोक्त दर्शन एवं पूजा से पापों का क्षय, मनोकामनाओं की पूर्ति तथा भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
पंचकेदार के पाँच धाम—
– केदारनाथ – शिव का कूबड़ (पीठ)
– मध्यमहेश्वर – नाभि एवं उदर
– तुंगनाथ – भुजाएँ (विश्व का सबसे ऊँचा शिव मंदिर)
– रुद्रनाथ – मुख
– कल्पेश्वर – जटाएँ (पूरे वर्ष खुला रहने वाला मंदिर)
*बदरीनाथ एवं पंच बदरीनाथ *
भगवान विष्णु के पाँच दिव्य स्वरूपों की आराधना पंचबदरी के रूप में की जाती है—
– विशाल बदरी (बदरीनाथ) – भगवान बद्शाल का मुख्य धाम।
– योगध्यान बदरी – ध्यानमग्न भगवान विष्णु का स्वरूप।
– भविष्य बदरी – मान्यता है कि भविष्य में भगवान विष्णु के दर्शन यहीं होंगे।
– वृद्ध बदरी – भगवान विष्णु का प्राचीन स्वरूप।
– आदि बदरी – प्राचीन मंदिर समूह, जहाँ भगवान विष्णु की आराधना होती है।
चारधाम, पंचकेदार एवं पंचबदरी की शास्त्रोक्त पदयात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि श्रद्धा, तप, संयम, सेवा और आत्मसाक्षात्कार का मार्ग है।जो डॉ ज्योति प्रसाद गैरोला ने 35 दिनों में 1600 किलोमीटर की यह पदयात्रा भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के प्रति समर्पण, आस्था और दृढ़ संकल्प का प्रेरणादायी उदाहरण है।
“अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥”